मैं यह लेख लिखते समय सिर्फ एक लेखक नहीं हूँ—मैं एक नागरिक हूँ, एक भाई हूँ, एक दोस्त हूँ, और सबसे बढ़कर… एक खिलाड़ी हूँ।
और आज मेरी कलम में स्याही नहीं, गुस्सा है। दर्द है। और एक ऐसी कड़वाहट है जो इंसान को मजबूर करती है कि वह सच को सीधे, कड़वे, नंगे रूप में दुनिया के सामने रख दे।
हरियाणा के दो बच्चों—हार्दिक और अमन—की मौत ने मेरे मन से वह आख़िरी उम्मीद भी छीन ली है कि “शायद इस बार व्यवस्था सीख लेगी।”
नहीं।
व्यवस्था नहीं सीखती।
वह शर्मिंदा भी नहीं होती।
वह सिर्फ एक काम करती है—मामला दबाना।
एक तरफ़ बच्चे जान गंवाते हैं, और दूसरी तरफ़ सिस्टम कागज़ों में “एक्शन ले लिया गया” की टिक-मार्क करके चैन की नींद सो जाता है।
यह हादसा नहीं—यह सिस्टम की हत्या है
दोनों घटनाएँ अलग-अलग जगहों पर हुईं।
दोनों में बच्चे खेल रहे थे।
दोनों पर भारी बास्केटबॉल पोल गिरा।
दोनों को गंभीर चोटें आईं।
दोनों अस्पताल पहुँचे।
और दोनों वापस नहीं लौटे।
क्या यह “संयोग” है?
नहीं।
यह लापरवाही है। यह जर्जर व्यवस्था है। यह जाँच न करने की आदत है। यह घायल पोल, टूटी नींव, सड़ चुके उपकरणों का वह अपराध है जिसका जुर्मनाम ज़िंदा बच्चों पर लिखा गया और मौत ने मुहर लगा दी।
हरियाणा जैसे राज्य, जो अपने खिलाड़ियों के लिए जाना जाता है, जहाँ हर घर में एक खिलाड़ी पैदा होता है, वहाँ अगर बास्केटबॉल पोल गिरकर बच्चों को मार दे…
तो यह हादसा नहीं—यह योजना अनुसार हुई मौत है।
क्योंकि जहाँ खतरा पहले से दिख रहा हो, चेतावनी हो, स्थिति खराब हो… वहाँ दुर्घटना नहीं होती, अपराध होता है।
खेल के नाम पर कब तक बच्चों को मारेंगे?
एक खिलाड़ी मैदान में हार जाए—चलेगा।
जीत जाए—बहुत अच्छा।
पर खेलते-खेलते मर जाए—यह अस्वीकार्य है।
यह अमानवीय है।
यह वह शर्म है जिसे कोई समाज सहन नहीं कर सकता।
पर हम सह रहे हैं।
और यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि सिस्टम को खिलाड़ियों की मौत से फर्क नहीं पड़ता।
आपने कहीं सुना है कि किसी अफ़सर की तनख्वाह रुकी?
किसी अधिकारी की गिरफ्तारी हुई?
किसी इंजीनियर पर केस चलाया गया?
किसी को जेल भेजा गया?
नहीं।
बस वही दो लाइनें —
“5 लाख दे दिए जाएंगे।”
“जिला खेल अधिकारी को सस्पेंड कर दिया गया है।”
और इसी को “एक्शन” कहा जाता है।
क्या 5 लाख देना और अधिकारी को सस्पेंड करना ही काफी है?
सरकार कहती है —
“परिवार को 5 लाख मुआवजा।”
“अधिकारी सस्पेंड।”
और बस?
क्या 5 लाख में एक माँ अपने बेटे को वापस खरीद सकती है?
क्या 5 लाख उसकी हँसी लौटा देगा?
क्या 5 लाख उसके सपने लौटा देंगे?
क्या 5 लाख उसकी आवाज़, उसकी जर्सी, उसके जूते, उसके गोल, उसकी जीत—सब वापस दे देंगे?
यह मुआवज़ा नहीं—यह व्यवस्था की शर्म छिपाने का तौलिया है।
और अधिकारी का सस्पेंशन?
यह कोई सज़ा नहीं।
यह तो दो महीने की छुट्टी है।
फिर से बहाल, फिर से वही कुर्सी, फिर से वही लापरवाही।
क्या यह न्याय है?
नहीं।
यह न्याय का मज़ाक है।
यह मृत्यु का अपमान है।
यह खिलाड़ी की कीमत लगाना है—5 लाख।
क्या कोई लौटा सकता है हार्दिक और अमन को?
मुझे जवाब दो—
क्या कोई उस 16 साल के बच्चे को वापस ला सकता है जो लखनमाजरा के मैदान में गिर पड़ा?
क्या कोई बहादुरगढ़ के हार्दिक और अमन को उनकी माँ की बाँहों में दोबारा डाल सकता है?
कौन जानता है—
कल ये बच्चे राज्य का नाम रोशन करते,
देश का सम्मान बढ़ाते,
ओलंपिक मेडल लाते…
पर अब?
अब सिर्फ़ उनकी तस्वीरें रह गई हैं—खिलाड़ियों वाली, जो अब इतिहास बन चुकी हैं।
और यह इतिहास हमनें लिखा—
हमारी उदासीनता,
हमारी चुप्पी,
और प्रशासन की सोई हुई संवेदनाओं ने।
सच यह है—सपने नहीं टूटे, सपनों को तोड़ा गया
खराब खेल उपकरणों ने तोड़ा।
जंग लगे लोहे ने तोड़ा।
बिना निरीक्षण के रखे गए ढांचों ने तोड़ा।
और सबसे ज़्यादा—
व्यवस्था की नींद और अफसरों की लापरवाही ने तोड़ा।
आज हार्दिक और अमन की मौत सिर्फ दो माताओं का दर्द नहीं है—
यह हर उस बच्चे का दर्द है जो मैदान में सपने लेकर उतरता है।
हर उस बाप का डर है जो अपने बेटे को खेलने भेजता है लेकिन मन में यह सोच दबा कर रखता है—
“कहीं कोई पुराना पोल गिर न जाए…
कहीं कोई खाली गड्ढा नुकसान न कर दे…
कहीं कोई टूटी ग्रिल, टूटा नेट, टूटा बैकबोर्ड उसके बच्चे को न ले जाए…”
यही डर आज सच हो गया।
सीधी बात — पैसे से मरम्मत नहीं होती, जिम्मेदारी से होती है
खिलाड़ी का खेल जीत के बारे में होता है।
लेकिन उसकी जान सुरक्षा पर टिकी होती है।
और इस देश में सुरक्षा कहाँ है?
स्टेडियम में टूटी कुर्सियाँ,
कोर्ट में जर्जर पोल,
फुटबॉल मैदान में गड्ढे,
कबड्डी मैट बिना शॉक-एब्जॉर्बर,
और तैराकी तालाब बिना लाइफगार्ड।
इस देश में खिलाड़ी खेल से कम,
खतरों से ज्यादा लड़ते हैं।
सवाल जो हर नागरिक को पूछने चाहिए
पोल गिरा कैसे?
आखिरी बार निरीक्षण कब हुआ था?
क्या इस पोल को सुरक्षित घोषित करने वाले अधिकारी पर केस दर्ज हुआ?
क्या सुरक्षा मानकों का पालन किया गया?
क्या कोई इमरजेंसी रेस्पॉन्स मौजूद था?
क्या ये मौतें रोकी जा सकती थीं?
इन सवालों का जवाब देने वाला कोई नहीं है।
क्योंकि जवाब देने पर कुर्सियाँ हिलती हैं।
और कुर्सियाँ इस देश का सबसे संवेदनशील हिस्सा हैं—
जनता नहीं, कुर्सियाँ।
जब तक लापरवाह अफ़सरों पर केस दर्ज नहीं होगा — तब तक मौतें होती रहेंगी
सस्पेंशन?
नहीं चलेगा।
आखिर किसी बच्चे की जान लेने वाले उपकरण की जिम्मेदारी कौन लेगा?
क्या सिर्फ़ “रिपोर्ट बन रही है” कह देने से बच्चों की जान वापस आ जाएगी?
अगर किसी उद्योग में, किसी फैक्ट्री में, किसी कंपनी में ऐसा हादसा हो…
तो अधिकारियों पर केस चलता है—IPC की धाराएँ लगती हैं, गिरफ्तारी होती है।
तो खिलाड़ियों की मौत पर कानून सो क्यों जाता है?
क्या खिलाड़ी नागरिक नहीं?
क्या उनका जीवन कम कीमती है?
क्या खेल के मैदान कानून से बाहर हैं?
अगर किसी बच्चे पर 200 किलो का पोल गिरता है—
यह “लापरवाही” नहीं
यह गैर-इरादतन हत्या (criminal negligence) है।
और इसका केस उसी तरह चलना चाहिए।
खिलाड़ी सिर्फ़ अपने विरोधी से नहीं लड़ता — वह सिस्टम से भी लड़ता है
वह मैदान में पसीना बहाता है—
और बाहर आकर भ्रष्टाचार से लड़ता है।
वह अपने खेल में मेहनत करता है—
और बदहाल ग्राउंड्स, टूटी सुविधाओं, और बदइंतज़ामी से युद्ध करता है।
वह प्रतिद्वंद्वी को हराता है—
लेकिन कभी-कभी स्टेडियम के टूटे सामान से हार जाता है।
यह युद्ध अनुचित है—
पर यह यही देश है।
मेरी अपील — एक खिलाड़ी की, एक नागरिक की, एक इंसान की
इस लेख को पढ़कर गुस्सा आए—अच्छा है।
दिल दुखे—और भी अच्छा है।
लेकिन बस पढ़कर आगे न बढ़ जाएँ।
अगर आपके इलाके में कोई टूटा पोल है—
उसकी फोटो डालिए।
अधिकारी को टैग कीजिए।
स्टेडियम मैनेजमेंट को भेजिए।
स्थानीय प्रशासन को रिपोर्ट कीजिए।
और सबसे ज़रूरी—
चुप मत रहिए।
चुप्पी सिस्टम की सबसे बड़ी जीत है।
और आवाज़ उसकी हार।
हार्दिक, अमन और हर उस बच्चे के नाम जो अब मैदान में नहीं लौटेगा
वे चले गए—
लेकिन हमें जागना होगा।
उनकी मौत को आंकड़ा बन जाने से रोकना होगा।
उनकी कहानी को सबक में बदलना होगा।
उनकी स्मृति को सुधार में बदलना होगा।
वे शायद कल देश का नाम रोशन करते—
पर आज उनके नाम से हम अपनी लड़ाई शुरू कर सकते हैं।
एक पंक्ति—जो मैं ज़ोर से, सीने में आग लेकर लिख रहा हूँ:
“खिलाड़ी को जीतने के लिए अभ्यास चाहिए, लेकिन जिंदा रहने के लिए सुरक्षित मैदान—और यह देना सरकार का काम है।”
निष्कर्ष — अब बस
अब और मौतें नहीं।
अब और बहाने नहीं।
अब और सस्पेंशन नहीं।
अब और 5 लाख का मौन-धन नहीं।
अब चाहिए—
जवाबदेही
कानूनी कार्रवाई
जाँच
मरम्मत
और सुरक्षित मैदान।
ताकि अगला हार्दिक, अगला अमन…
मैदान से मेडल लेकर निकले,
मौत नहीं।
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